रविवार, 6 दिसंबर 2009

अग्नि परीक्षा

एक वक्त था
तुम आज़माना चाहते
तो आज़मा लेते।
के इतनी शिद्दत से शायद ही
तुम्हे किसी ने
कभी चाहा हो।
मैं क्या न कर देती तुम्हारे लिए।
पर अब...
मैं कोई अग्नि परीक्षा नही दूंगी.



मैं कोई अग्नि परीक्षा नही दूंगी.
कह के मैं उदासी की धरती में,

चुपचाप समा जाती हूँ.

15 टिप्‍पणियां:

  1. पर अब...

    मैं कोई अग्नि परीक्षा नही दूंगी.

    अंदाज अच्छा है , बात कहने का

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  2. मैं कोई अग्नि परीक्षा नही दूंगी.
    कह के मैं उदासी की धरती में,

    चुपचाप समा जाती हूँ.

    कई बार सोचता हूँ कि--वो तब वैसा क्यों नहीं हुआ था, या फिर कहाँ चूक हुई थी...वगैरह-वगैरह..! नारी मन की गुत्थियाँ....आकर्षक और दुरूह भी...

    अग्नि-परीक्षा तो फिर सतत है...कुछ उदासी इतनी शांत भी नहीं होती.....!
    आपके शब्द इतना कुछ कैसे कहने लग जाते हैं...?
    उम्दा...बधाई...!

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  3. पर अब...
    मैं कोई अग्नि परीक्षा नही दूंगी.
    यह संकल्प होनी ही चाहिये. आखिर अग्निपरीक्षा क्यो और किसके लिये?

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  6. I think it takes a lot to understand this piece of your writing. You are adamant not to go for any more 'agni-pariksha' but still choose to end yourself in the old way. You have given new meaning to old conventions but still won't let go some of these.This is the real world dilemma women are facing. Excellent poetery I think, very well expressed emotions. This is the best piece of writing I have ever come across. Anybody tell me how to write in Hindi on computer? My keyboard has no hindi alphabets.Are you thinking of getting your poems published in a book at some stage. I think you should go for it.All the best to You Dimple.

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  7. I think it is one of your most beautiful creations. Unfortunately someone on the forum who has given some personal comments has neither any understanding of the poetry nor any respect for women.That is why he is misinterpreting this poem. It is said ' Ja ki rahi bhavna jaisi , prabh moorat tin dekhi vaisi'. My piece of advice for that person is before commenting try to reach the depth of the poem.

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  8. एक वक्त था
    तुम आज़माना चाहते
    तो आज़मा लेते।
    के इतनी शिद्दत से शायद ही
    तुम्हे किसी ने
    कभी चाहा हो।
    मैं क्या न कर देती तुम्हारे लिए।
    पर अब...
    मैं कोई अग्नि परीक्षा नही दूंगी






    डिम्पल ....मेरे लिए ये कविता यहां पूर्ण हो जाती है .अपने सारे अर्थ लिए......क्या कहती हो......
    वैसे कविता बेमिसाल है ....

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  9. पर अब...

    मैं कोई अग्नि परीक्षा नही दूंगी.

    मैं कोई अग्नि परीक्षा नही दूंगी.

    कह के मैं उदासी की धरती में,
    चुपचाप समा जाती हूँ.
    ये तो नारी मन है जो कभी कह तो सकता है कि अग्नि परीक्ष नहीं दूंगीं पर जब मौका होगा तो पत्पर होगा ये ही नारी मन अग्नि परीक्षा के लिये भी और समर्पण के लिए भी

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  10. Hello Dimple,

    Perfect work done!
    Very nicely composed.

    Regards,
    Dimple
    http://poemshub.blogspot.com

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  12. hey dimple......yesterday I was trying to access your blog but coundnt access..... but ab aakar to bas yahi kahenge " Lajawaab"

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  13. मैं कोई अग्नि परीक्षा नही दूंगी - देनी भी नहीं चाहिए. सार गर्भित. बधाई और शुभकामनाएं - यूँ ही लिखती रहो.

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  14. yaar...aap kamaal likhti hain .. :) ..amazing few lines by you ...great !!!

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  15. UDASI KI DARTI MEIN CHUPCHAP SAMA JANE KA KYA MATLAB ? ... KAVITA KI CHOT KUCH KAM HO GAI ..LEKIN BAHUT SUNDAR KAVITA ... CHINTAN MEIN KUCH AUR GAHRE UTAR PAO TO KAVITA KE JWAHRAT BIKHRE PADE HAIN AAPKE BHEETAR

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...क्यूंकि कुछ टिप्पणियाँ बस 'टिप्पणियाँ' नहीं होती.