गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

कच्ची पगडंडियो से,पक्की सड़क का सफ़र.
तपती जलती,दोपहर को निकलते थे हम.
चुपके चुपके हवेली से,आम के बागो की तरफ.
झोली में भर लेते कच्चे,खट्टे आम.
सूखे पत्ते, दबे पांव चलने पे भी करते थे कचर कचर.
बुढ़िया जब तक न भगाती लाठी लेकर.
यूँही बेफिक्र घूमते रहते इधर से उधर.
बाग से निकल कर कर लेते नदी का रुख हम.
दूर तक बहती थी जाने किधर जाती थी.
सावन के महीनो में ऊपर तक भर जाती थी.
गोल टीका जो आस्मां में मुस्कराता था,
कांपते पानी में रह रह के थरथराता था.
मजार पे पीर की दिए जलते थे.
मन्नते मांगते लोग दुआ करते थे.
कच्चे पक्के कुछ ही घरो से मिलके बना था.
कोई ऊँचा भवन और महल नहीं था
अच्छा था,
.मेरे गाँव में कोई शहर नहीं था..

19 टिप्‍पणियां:

  1. दूर तक बहती थी जाने किधर जाती थी.......

    दिल्ली की सड़कों पर जब निकलते थे, चलते चलते थक जाते थे, तो सोचते थे कि ये सड़क आगे जाती कहां है....बड़े हुए तो समझे की .. स़ड़क नदी के पानी की तरह कहीं नहीं जाती, लोग उसपर चलते-चलते जाने कहां पहुंच जाते हैं......

    हो सकती है सोचो का ये मिलान आपको बेतुकी लगे....
    पर ....

    मेरे शहर में कोई गांव नहीं था............

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  2. "मेरे गाँव में कोई शहर नहीं था.." सुंदर रचना -
    नहीं था - बधाई और ना हो - शुभकामनाएं

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  3. कच्ची पगडंडियो से,पक्की सड़क का सफ़र.
    तपती जलती,दोपहर को निकलते थे हम.
    चुपके चुपके हवेली से,आम के बागो की तरफ.
    झोली में भर लेते कच्चे,खट्टे आम.
    Bahut khoob!

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  4. अच्‍छी बात है कविता के माध्‍यम से आपने अच्‍छी बात कहने की कोशिश की है

    एम.मुबीन

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  5. अपने गाँव के आम के बागों की याद ताजा हो गई. अब तो वहाँ बाग भी नही रहे और आम भी डब्बे मे पैक हो कर आते हैं.

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. बहुत सुन्दर रचना है मगर मेरे शहर मे दोनो हैं । स्वागत आपका। "आपको भी होली की शुभकामनाएँ

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  8. खोजता हु आज भी मै दादी की कहानी
    जो नींद आने के पहले कभी खतम नहीं होती थी

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  9. humm....!!
    darpan ka comment padh raha hun aor pahla vala bhi .....kuch socha dimple?

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  10. आप और आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ...nice

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  11. आपको व आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें

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  12. आपको और आपके परिवार को होली की बहुत बहुत शुभ-कामनाएँ ...

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  13. आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

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  14. मेरे गाँव में कोई शहर नहीं था
    सब खुला था, कोई बंद घर नहीं था

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  15. एक जीया हुआ इत्मीनान यानि बचपन ही था वो जिसे गाँव कहते हैं आज हज़ार उलझनों को सुलझाते हुए शहर एक लम्बी छुट्टी चाहता हूँ मैं भी.

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  16. कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

    धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

    कलम के पुजारी अगर सो गये तो

    ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

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  17. कवितापन तो कम लगता है इस कविता मे..सब कुछ एक गहरे नॉस्टाल्जिया मे डूबा सा लगता है..उन स्मृतियों के नाम जो न जाने कब हमारा पल्ला छुड़ा कर चली गयीं..हमें खुद पता नही चला..मगर कुछ गाँव आज भी ऐसे मिल जाते हैं जिनमे बस गाँव ही रहते हैं अभी..मगर अचरज की बात है कि किसी गाँव को किसी शहर मे नही रहते देखा आज तक..या शायद गाँव भी शहर पहँच कर पतलून पहन लेते होंगे आजकल..पहचाने तो नही जाते!!

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...क्यूंकि कुछ टिप्पणियाँ बस 'टिप्पणियाँ' नहीं होती.