बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

उत्सव

 उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं.
इसलिए समाज से वाकिफ हो जाता है.

वो,
घबराता है हकीकत के चेहरों से.
और चला जाता है,
डिप्रेशन के तहखाने में.

उसे,
सिर्फ उसे..
दिखती है,
कभी दिवार पर,
कभी परदे के पीछे,
अनजानी परछाईया..

वो,
पहचान लेना चाहता है उन परछाईयो को..

वो,
या तो कवि बनता,
या फिर यौद्धा..

उसने सुनी होंगी
हा फिर पढ़ी होंगी,
यकीनन कभी न कभी,
मुर्दा दिलो में गैरत जगाने के बात..

अचेतन ही कविता कि किताब को बंद कर,

वो,
निकल पड़ता है..
युद्ध के मैदान में.

आमने सामने है दोनों.
इक तरफ ताक़त और
दूसरी तरफ वो..

वो,
दिमागी तौर पे जहीन है..
पर ठीक नहीं.. 

19 टिप्‍पणियां:

  1. उसने सुनी होंगी
    हा फिर पढ़ी होंगी,
    यकीनन कभी न कभी,
    मुर्दा दिलो में गैरत जगाने के बात..


    bahut achha likha hai....

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  2. Hello Dimple,

    It is very deep composition... Done a great job!
    You have magnificent thoughts... and ofcourse the art to pen them down!

    Regards,
    Dimple
    http://poemshub.blogspot.com

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  3. निदा फाजली की एक कविता याद आई ... कुछ टूटी हुई सी पंग्तियाँ

    "बला का ज़हीन था
    जीना मुहल था
    फिर भी बवाल था
    कहता था
    माँ की कोख से तारीख कब्र तक एक रास्ता है"

    आप थोडा हिम्मत और करती... वो क्या है ना तीखे तेवर ज्यादा पसंद आते हैं, पर मैं ये थोप नहीं सकता ना.
    "सुना है आज कल उन्हें भी भगवन का ही भरोसा है - बकौल उनकी पत्नी "

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  4. ओर मैंने सुना था के जहीन लोग अब भी बंद है अपने बनाये हुए तहखानो में ओर जो बाहर है वो खड़े है हाथ में चुप्पी के साइन बोर्ड लेकर

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  5. उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं.
    इसलिए समाज से वाकिफ हो जाता है....

    आज का सच है ...
    जो असलियत जानता है समाज के ठेकेदारों की उसको अक्सर बीमार ही कहा जाता है ..... नक्कारखाने में तूती कोई नही सुनता ..... बहुत गहरी रचना ... झंझोड़ती है अंदर तक ..........

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  6. सुंदर अभिवयक्ति! जानती हूं कवि से योद्धा बनने वालों को..देखा है उन्हे कविता और ताकत से परास्त होते हुए...

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  7. dimple ji pahli do panktiyaan hi sab kuch keh rahi hai..par ab kaun khada hai 'utsav' ke saath?

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  8. उसने सुनी होंगी
    हा फिर पढ़ी होंगी,
    यकीनन कभी न कभी,
    मुर्दा दिलो में गैरत जगाने के बात...

    kya baat hai....Zinda hote hue kitne murda hai ham saare .....good one

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  9. dimple, Is poem ko agar aap apne nazariye se samjhayegi to aur accha hoga

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  10. अचेतन ही कविता कि किताब को बंद कर,

    वो,
    निकल पड़ता है..
    युद्ध के मैदान में.

    आमने सामने है दोनों.
    इक तरफ ताक़त और
    दूसरी तरफ वो..


    कुछ मिल गया कविता में जिसे लेकर जा रहा हूँ..कुछ अपना सा लगा

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  11. उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं.
    इसलिए समाज से वाकिफ हो जाता है.

    वो,
    एक बेहतरीन व्यथा कथा.चंद शब्दों में बहुत गहरी बात.
    बहुत प्रभावशाली रचना सुंदर दिल को छूते शब्द

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  12. बहुत अच्छी कविता.
    ..बधाई.

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  13. महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!
    बहुत बढ़िया लगा ! बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने ! बधाई!

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  14. मुझे यहाँ क्या कहना चाहिए? मैं स्व से पूछता हूँ

    उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं.
    इसलिए समाज से वाकिफ हो जाता है.

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  15. pahli bar aapko padha par padhkar man khush ho gaya achi rachna ke liye bahut-bahut badhai

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  16. आह!

    ये होता है कवि...ये होती है कवि की ताकत। कौन कहता है कि वो योद्धा अकेला था या मानसिक रुप से व्यवस्थित नहीं था। य्दि सचमुच ऐसा होता तो उसके संग यूं कवि की लेखनी न उठ खड़ी होती।

    सोचता हूं कि आखिर कितने लोगों से ये कविता पढ़ी होगी और पढ़ने वालों में कितनों से कुछ समझ कर लिखा गोगा यहां टिप्पणी में।

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  17. उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं.
    इसलिए समाज से वाकिफ हो जाता है.
    सही है समाज से वाकिफ होने वालों का वाकई दिमागी हालत ठीक नहीं है (समाज के नज़रिये से).
    बहुत गहराई लिये कविता
    बधाई

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  18. उत्तमा के यहाँ पढ़ा था फिर ये कविता समझ और संवेदन का व्यवहार अबूझ है. अच्छी कविता.

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...क्यूंकि कुछ टिप्पणियाँ बस 'टिप्पणियाँ' नहीं होती.