शनिवार, 23 जनवरी 2010

जब पिघली थी ,
आवाज़े
तेरी और मेरी.
आंखे,
भरी भरी सी लगी.
इस तरह शायद नदिया बनी होंगी.

टेढ़े,मेढे
रास्तो से गुजरती,
बहती,
सनसनाती.
किसी भक्ति में लीन
दरवेश के आगे से गुजरते वक़्त,
यूँ चुप हो जाती
जैसे,
तपस्या भंग करने का
श्राप नहीं लेना चाहती.

फिर भी,
जाने कैसे,
किसी दर्द का असर,
या दुआओ का करम था,
कि आखिर ये नदिया सूख ही गयी..
पर  पलकों पे इनका स्वाद अभी तक है..




























जान ही जायेगी अब तो लगता है,
तेरा आना नज़र नहीं आता.
कोहरे से विजिबिलिटी शुन्य है.

10 टिप्‍पणियां:

  1. पर पलकों पे इनका स्वाद अभी तक है..-----बहुत सुन्दर रचना शुभकामनायें

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  2. जब पिघली थी ,
    आवाज़े
    तेरी और मेरी.
    आंखे,
    भरी भरी सी लगी.
    इस तरह शायद नदिया बनी होंगी.
    behad nazuk aur khoobsoorat khayal...aur ye antim teen panktiyaan bhi khoob hain.

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  3. फिर भी,
    जाने कैसे,
    किसी दर्द का असर,
    या दुआओ का करम था,
    कि आखिर ये नदिया सूख ही गयी..
    पर पलकों पे इनका स्वाद अभी तक है..
    amazing

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  4. आज मालुम चला नदियाँ कैसे बनी..
    जब पिघली थी ,
    आवाज़े
    तेरी और मेरी.
    आंखे,
    भरी भरी सी लगी.
    इस तरह शायद नदिया बनी होंगी.

    बहुत खूब!
    कि आखिर ये नदिया सूख ही गयी..
    पर पलकों पे इनका स्वाद अभी तक है..

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  5. पंक्तिया बहुत सी है काबिले तारीफ
    सोचता हूँ किस-किस की करू तारीफ
    फर्क मात्र इतना है की आप अपने दिल में उठने वाले ख्यालो को शब्दों में पिरो कर कविता लिखते हो और मै उन्ही शब्दों से गुफ्तगू करता हूँ. आपका भी मेरी गुफ्तगू में स्वागत है.
    www.gooftgu.blogspot.com

    जान ही जायेगी अब तो लगता है,
    तेरा आना नज़र नहीं आता.
    सुन्दर और दिल को मोहने वाली कविता के लिए बधाई.

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  6. कभी कभी नदी जम जाती है और दूर से हमें सुखी हुई नजर आती है...
    जाकर करीब से देखना कभी गर मौका मिले...शायद वो जम कर और पुख्ता हो गयी हो...

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  7. जाने कैसे,
    किसी दर्द का असर,
    या दुआओ का करम था,
    कि आखिर ये नदिया सूख ही गयी..
    पर पलकों पे इनका स्वाद अभी तक है..


    Waqt ka takaza tha....inko to sukhana hi tha....samandar se nahi mili fir namkeen kyon ....barish hogi fir se...suna hai amrit bhi barasta hai...ek boond jo giri na muhane par phoot padegi dariya fir se :-)

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  8. कुछ आँखों में बसी नमी का भी असर रहा होगा...

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  9. बार बार कमेन्ट लिखा और फिर सोचा... फिर मिटाया फिर लिखा... पर कुछ भी लिख नहीं पाये... आपकी चंद पंक्तियों ने निशब्द कर दिया... वियोग की... पीड़ा की... बेहद ख़ूबसूरत अभिवक्ति !!!

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  10. पिघली आवाजों की नदी का दरवेशों के आगे चुप हो जाना और फिर होठों से सूख कर आँखों मे स्वाद की तरह जम जाना..किसी अहसास के अधूरे सफ़र की कहानी जैसी लगती है..और यह सूखना जैसे किसी श्राप का असर नही वरन्‌ कुछ दुआओं के करम जैसा लगता है..
    ...भावपूर्ण पंक्तियाँ..जीरो विजिबिलिटी मे भी राह बनाती सी..

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...क्यूंकि कुछ टिप्पणियाँ बस 'टिप्पणियाँ' नहीं होती.