मंगलवार, 12 जनवरी 2010

कुछ वरक,
कुछ शब्द,
और कुछ किताबे.


किताबो जैसे लोग
या लोगो जैसी किताबे.


कुछ फ़ैली लीक से हटकर,
रह गयी कुछ सुंदर कवर में ,
सिमटकर.


पंचतंत्र
ज़िन्दगी यही से शुरू थी,
या इससे भी पहले कही.

कई पढ़ी थी शुरू से अंत तक,
कुछ जो बिकी थी हाट केक की तरह,
पढ़ी आधी ही मैंने,
शायद २६ पन्ने ही..

हर सस्पेंस नोवेल का अंत ,
शुरू में ही पढ लिया.

कुछ मैं न समझी,
कुछ ने मुझे न समझा..

इक पड़ी है अब भी कोरी किताब,
जिसे पढना है मुझे फुर्सत से,
सबसे आखिर में.
शुरू से अंत तक.

कभी कभी ही तो खुलती है
ज़िन्दगी की बंद किताब..

22 टिप्‍पणियां:

  1. Hello Dimple,

    Happy New year! I wasnt able to access your blog for quite some time... and now that I can... :-) it is good to read the stuff...

    Very nice concept and pretty different portray :)

    Great work!
    Regards,
    Dimple

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  2. कभी कभी ही तो खुलती है
    ज़िन्दगी की बंद किताब..
    सच और सही.

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  3. क्या है भई आज कल बहुत किताबें पढ़ी जा रही हैं .पिछली पोस्ट में किताब पढ़ी, इस पोस्ट में भी किताब पढ़ी. क्या लाइब्रेरी में नौकरी कर ली है या बहुत खुश नसीब हो कि पढ़ने के लिए फुर्सत के कुछ पल चुरा लिए. मुझे तो पढ़ने वालों से इर्ष्या होती है, मुझे तो आसानी से समय नहीं मिल पता जिदगी के २४ साल रेगुलर पढ़ाई में लिकाले १७ साल दूसरों को पढ़ाने में बस अपने लिए ही वक्त कम पड़ जाता है. बुरा ना मानना ये जो नाम है डिम्पल बहुत अपना सा है, सो लिख दिया क्योंकि मेरी एक बेटी का घर का नाम है. उसे कुछ भी कहो गालों में बड़े बड़े डिम्पल डाल कर हंस देती है.
    कभी कभी ही तो खुलती है
    ज़िन्दगी की बंद किताब..
    जब जब भी खुले ये किताब, जीवन के अनछुए पल ही पकड़ना क्योंकि उन्हें जानना जरुरी है न कि उनसे भागना.

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  4. बहुत पसंद आई यह कविता... विशेष कर

    किताबो जैसे लोग
    या लोगो जैसी किताबे.

    हर सस्पेंस नोवेल का अंत ,
    शुरू में ही पढ लिया.

    यह बेचैनी मुझे भी है

    कभी कभी ही तो खुलती है
    ज़िन्दगी की बंद किताब..

    और सबसे हट कर और सुन्दर .... २६ पन्नो वाला पैकर बहुत भाया

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  5. kabhi kabhi to khulti hai zindagi ki band kitab.....
    ..very nice...

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  6. '' हर सस्पेंस नोवेल का अंत ,
    शुरू में ही पढ लिया. ''
    --- यह तो ठोस सच्चाई है और एक हद तक त्रासदी भी !
    जब किसी चीज का 'फ्रेम' पहले से तय हो जाता है तो संभावनाएं
    भी दरकिनार कर दी जातीं हैं ... व्यक्ति और किताब का पाठ विकृत
    हो जाता है .
    और सोचने लगो तो ये २६ पन्ने कहाँ ख़तम होते
    हैं जल्दी क्योंकि ''कुछ वरक,/कुछ शब्द,/और कुछ किताबे.'' आपस में बड़े
    गुथे हुए रहते हैं, प्रोफेसनल
    परीक्षा पास करने वाली जल्दबाजी न हो तो ......
    .
    ............ आभार ,,,

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  7. kitana sach kaha aapne...

    kiataben ke pannon me bhee ek samanantar kitana kuchh khuda pada hai..!

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  8. मैंने आपके ब्लौग के इस टिप्पणी को लेकर लगे टैग लाइन को अनजाने में अपनी एक पोस्ट के लिये इस्तेमाल कर लिया था। कभी नजर पड़ी थी....

    लेखनी का ये अंदाज खूब भाया मैम....विशेष कर सस्पेंस नावेल के आखिरी पन्नों को पहले देख लेनी वाली बात अपनी सी लगी।

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  9. Pure gold! Very well said for Panchatantra and Suspense novels. For those of us who are not fond of reading it would be suspense movies , I guess.I know a few people who really have the patience to read the suspense novels till its end without reading the climax, but it is good to know so many of us including you do the opposite. This poem is one of your most beautiful creations. No wonders so many people can identify themselves with it.

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  10. इक पड़ी है अब भी कोरी किताब,
    जिसे पढना है मुझे फुर्सत से,
    सबसे आखिर में.
    शुरू से अंत तक....

    इस ज़िंदगी की किताब को पढ़ने में पूरी ज़िंदगी निकल जाती है ............ बहुत ही अच्छा लिखा है .......

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  11. kitabon ke saath practically to wo sab kiya jo aapne likha .......par kitabon jaise kirdaar nahi mile....waha charecter to define hota hai...aur yaha to pal pal badalta hai......lekin aapka andaz-e-bayan bhaya......gulzaar ko fir se yaar karya......keep writing:-)

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  12. ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो.

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  13. कुछ मैं न समझी,
    कुछ ने मुझे न समझा..
    inheen panktion me rachna ka nichod aa gaya!

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  14. जिंदगियाँ भी..
    कुछ फ़ैली लीक से हटकर,
    रह गयी कुछ सुंदर कवर में ,
    सिमटकर.

    लीक से हट कर फ़ैली जिंदगियाँ सबसे ज्यादा चर्चित होती है..मगर सबसे कम पढ़ी जाती है..कोई बनी-बनाई लीक नही छोड़ना चाहता है सो..सुंदर कवर मे लिपटी किताबों को भी हर कोई अपने ड्राइंग-रूम मे सजा लेना चाहता है..बिना समझे कि किताबें सजाने के लिये नही पढ़े जाने के लिये होती हैं..
    ..और उन किताबों का क्या जिन्हे बस एक बार पढ़ कर रख देता है हर कोई..और दूसरी किताबों की ओर बढ़ जाता है...बंद दराजों मे रखी किताबें लोगों की स्मृति से उतनी ही जल्द धँधली पड़ जाती है..जितनी जल्दी उनकी इबारत!!

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  15. (don't publish it)

    किताबों की दुनिया
    किताबों की बातें
    समझ जाते दुनिया
    जो न पढ़ते किताबें
    :-)

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  16. आपकी कविताओं को गंभीरता से देखता हूँ और उन्हें सहजता से अपने भीतर समेट लेना चाहता हूँ. मुझे जिंदगी के अनुभव को शब्द देने वाले प्रयास बहुत प्रभावित करते हैं. इन दिनों कविताएं एक टापू पर ठहरे हुए समय सी जान पड़ती है मुझे, ये सम्भवतया मेरे भीतर घुस आये एकाकीपन के कारण है या फिर कविताएं ही ऐसा बोलती है.

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  17. बहुत अच्छे अंदाज में जिंदगी की किताब का वर्णन , अंतिम दो लाइनें बेहद सुंदर हैं

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  18. इक पड़ी है अब भी कोरी किताब,
    जिसे पढना है मुझे फुर्सत से,
    सबसे आखिर में.
    शुरू से अंत तक.

    कभी कभी ही तो खुलती है
    ज़िन्दगी की बंद किताब..






    ओर जब कोशिश करोगी पढने की भी तो भी आखरी पन्ने का रहस्य नहीं खुलेगा..... सस्पेंस...ही रहेगा ...कितने कवर में मिलती है ये किताब !!!

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  19. बहुत सुंदर रचना है।

    नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ द्वीपांतर परिवार आपका ब्लाग जगत में स्वागत करता है।

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  20. बहुत बहुत सुन्दर ...यही ज़िन्दगी की किताब का रोमांच है जो अंत तक खुल नहीं पाता है ..हर एक वर्क न जाने खुद में क्या क्या समेटे हुए है ..आपका ब्लॉग पर हर लफ्ज़ बहुत अपना सा लगता है .शुक्रिया

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  21. bahut behtareen rachna likhne ki malkaa hai aap... aapke blogs ko dekhkar aisa mahsus hua hume.... aap kabhi hamare blogs aaye

    http://aleemazmi.blogspot.com

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...क्यूंकि कुछ टिप्पणियाँ बस 'टिप्पणियाँ' नहीं होती.