सोमवार, 4 जनवरी 2010

पढ़ा था,
किसी किताब में,

धरती गोल है.

देखी है,
धरती की दो खिड़किया,
जो लकड़ी फूलने से बंद हो गयी थी...

..या फिर,
मैंने ही हमेशा बंद देखी.


मेरे कदमो को पहचान थी ,
उसके चप्पे चप्पे की.
मेरे हाथो में स्पर्श थे,
उसके विशालकाय दरवाज़े के.

बाहर का कोई रास्ता दिखा ही नहीं..

बस,
दिखता था मेरे हिस्से का कैनवस जैसा ,
थोडा सा आस्मां..


सुनायी पड़ती थी..
चलती फिरती,
अबदन..
..अशरीर..
आवाज़े,

कल्पना और आवाज़े.

ज़र्द आवाज़े,

जादूगरनी की किसी..
..जो खिला देगी कोई ज़हरीला फल..


मीठी आवाज़े,
राजकुमार के चूमने से,
ज़ी उठेगी राजकुमारी फिर से..


कई बार चाहा के,
फांद लूँ ये दरवाज़ा इन्ही आवाजो के सहारे..


मिल गयी अगर ,
इन आवाजो में रोशनी गर तो क्या होगा?


और गर मेरा अस्तित्व ,
न आ पाया धरती की ग्रेविटी में तो?

सर्द आवाज़े.
कांपती आवाज़े,

चेताती आवाज़े.
भरमाती आवाज़े,


सुना है,
शायद कोई नई धरती मिली है..




त्रिवेणी (पहली जनवरी की headlines)

नया दिन,नया साल,नई उम्मीदें .
हो रही हैं अब भी मादा भ्रूण हत्या,
गिद्धों  को बचाने की  पहल.

24 टिप्‍पणियां:

  1. नयी धरती मिली है ...?
    नया आसमान भी होगा ..
    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ....!!

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  2. बहुत सुन्दर नयी धरती मिली है ...बहुत पसंद आई यह रचना शुक्रिया

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  3. अब तक पढ़ी आपकी अन्य रचनाओं से भिन्न एक अच्छी रचना.

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  4. ये कौनसा जादू है.. सिर्फ जादू ही है...

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  5. डिम्पल जी ! .
    ...एक बात तो ज़रूर है कि अगर नयी धरती न भी मिले तो भी आप जैसे सम्वेदनशील कलमकार इस धरती को नया बनाने की क्षमता रखते हैं...मैंने सुना है भगवान के बाद अगर कोई सृष्टि की रचना कर सकता है तो वह कवि मन ही होता है....आप ने ख्यालों की उड़ान भरी ...फिर उस उड़ान में संतुलन बनाया तब कहीं जा कर कुछ पंक्तियां इस ज़मीन के किसी कागज़ पर उतरी होंगीं....इस गहरायी तक पहुँचने के लिए और फिर सभी को उसका अहसास करवाने के लिए बहुत बहुत
    मुबारकबाद... ...उम्मीद है आप अपने अन्दर के कवि को हमेशां अपने साथ बनाये रखेंगे...

    इसी इच्छा और आशा के साथ....

    रेक्टर कथूरिया

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  6. हर नयी पोस्ट के साथ आपकी रचनाओं की प्रगल्भता बढ़ती सी जाती है..सतत!!..एक बहुत बेहतरीन रचना..
    धरती की खिड़कियाँ, कैनवस जैसा आस्माँ, कदमों को पहचान होना, हाथों मे स्पर्श होना और ऐसे ही बिम्ब इस रचना को एक सफ़ल संप्रेषणीय कविता बनाते हैं..उन विशालकाय दरवाजों के उस पार का वातावरण सा रचते हुए..
    और बंद खिडकी के उस पार से कनवस भर आसमाँ की कल्पना परवीन शाकिर जी की एक नज़्म की याद दिलाती है जो उन्होने यासर अराफ़ात के लिये लिखी थी..और उसकी शुरुआती पंक्तियों की शिद्दत दिल की दीवारों पर चिपकी रह गयी..

    आसमान का वह हिस्सा
    जिसे हम अपने घर की खिड़की से देखते हैं
    कितना दिलकश होता है
    ज़िन्दगी पर यह खिड़की भर तसर्रूफ़
    अपने अंदर कैसी विलायत रखता है

    अपने टिपिकल अंदाज से हट कर नये क्षितिज तलाशती आपकी कविता पर यह आपकी पंक्ति फ़िट बैठती है

    सुना है,
    शायद कोई नई धरती मिली है..

    हाँ त्रिवेणी भी कुछ नया कहती है..मगर तीसरी पंक्ति वाला आवश्यक एक्स-फ़ैक्टर मिसिंग लगता है...

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  7. अपूर्व के शब्दों से आगे सूखा है मेरे लिए
    कविता लाजवाब है, महसूस होता है कि शब्द अपने साथ बहा ले जा रहे हैं.

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  8. मैं लोढ़ा पहले पढ़ रहा था ---
    '' Posted by dimple
    पढ़ा था,
    किसी किताब में ''
    :)
    फिर गलती सुधारी और कविता पर आया ..
    कविता और अपूर्व भाई की टिप्पणी , दोनों गजब !

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  9. बहुत खूब रहा ये अंदाज़ भी.कैनवास धरती असमान सब अपनी जगह मजबूत बनाए हुए है और कविता को एक नयी दिशा दे रहे हैं. बहुत बहुत बधाई
    from one of my posts
    "क्यों, दूसरो के आसमां, में तारे बहुत हैं ज्यादा
    क्यों मेरे आसमां में एक चाँद भी नहीं है"

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  10. देखी है,
    धरती की दो खिड़किया,
    जो लकड़ी फूलने से बंद हो गयी थी...

    ..या फिर,
    मैंने ही हमेशा बंद देखी.


    शायद हाँ....शायद देर से खोली !

    बस,
    दिखता था मेरे हिस्से का कैनवस जैसा ,
    थोडा सा आस्मां..

    कभी चकोर ओर कभी गोल !

    कई बार चाहा के,
    फांद लूँ ये दरवाज़ा इन्ही आवाजो के सहारे..

    बड़ा मुश्किल ये फलांग भर की दूरी चलना भी !गुलज़ार कहते है ना... हाथ भर के फासले को उम्र भर चलना पड़ा
    सुना है,
    शायद कोई नई धरती मिली है..

    काश !!

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  11. पढ़ा था,
    किसी किताब में ''

    ..... पढ़ा था जिस किताब में की इश्क तो हरम है,
    हुई वही किताब गम
    बड़ी हसीं ...

    anyway ...

    दिल साफ़ हो तो ऐसी ही दृष्टि उभरती है... सच्चे - सच्चे, सीधे- सीधे...

    त्रिवेणी में कमजोर हूँ... माफ़ी...

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  12. सुना है,
    शायद कोई नई धरती मिली है....

    गहरे भाव सिमेटे हैं इस रचना में ......... आपको नये साल की बहुत बहुत मुबारक .........

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  13. Isn't it ironical that we are not giving the prince a chance to bring Snow white back to life. You know why ?we are not letting Snow White come into existence at all. So rampant is female infanticide in India.Good to see this message coming through your poem.Keep up the good work.

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  14. बहुत सुन्दर रचना
    बहुत बहुत आभार

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  15. Dimple sabne itni tareef ki aur bahut badi-badi baatein likhi ......lekin hamare nanhe se dimaag mein aapki ye rachna samajh nahi aayi......will u please help me to explain

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  16. bada ghoomaya aapne bhai....aapke comment se hi aapki poem ko samajh paaye.....yes ham sab afsos jahi karte hai female infaticide ka.....but agar iske kaarno ko hi khatma kiya jaaye to it will disappear automatically.....I think we all should try to stop crime against women and women should be aware for that.... abhi tak kya hua itne saare acts ka lawyers ke chamber ki shobha badhate hai .....Ek mansikta aur soch ko badalne ke liye mahaul banane ki zaroorat hai ......AM I right ?

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  17. बहुत सुंदर रचना है।
    द्वीपांतर परिवार की ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  18. मेरे कदमो को पहचान थी ,
    उसके चप्पे चप्पे की.
    मेरे हाथो में स्पर्श थे,
    उसके विशालकाय दरवाज़े के.
    wah wah...kya baat hai..
    bahut khoob

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  19. Hello,

    Wow!!
    Nice picture drawn till the climax :)
    Like it.

    Regards,
    Dimple

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  20. dharti gool hai kinara nahi hai koi
    to kis tarha se miliga mujhe apna kinara..

    aapke thots gazab k hai...

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