शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

सूना-सूना सा आकाश
बसा है मकानों की छतों पे अभी..

परदें हटाओ गर
तो खिड़कियों पे..
 दिखती है खामोशी की परछाइयाँ..

लिपटी पड़ी है उदासी सी
सीखचों पे भी..

मगर कभी गुटका करेंगे
कांपते कबूतर रोशनदानों में..

सर्द कागज़ पर बर्फ से लफ्ज़
पिघल निकलेंगे..

हरी हवा उगने लगेगी
पतझड़ी समय में..

डार परिंदों की निकलेगी बतियाते हुए..
नज़र थिरकेगी हर शैय पे आते जाते हुए..

गुनगुनी धूप सहलाएगी सारी फ़िज़ा को..

जमा-रुका सा कुछ मन में
दस्तक देगा..

खुले दरीचों में से दिखने लगेगी
..बसंत-बसंत..

24 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! डिम्पल जी,
    इस कविता का तो जवाब नहीं !
    विचारों के इतनी गहन अनुभूतियों को सटीक शब्द देना सबके बस की बात नहीं है !
    कविता के भाव बड़े ही प्रभाव पूर्ण ढंग से संप्रेषित हो रहे हैं !
    आभार!

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  2. बसंत बसंत
    सुंदर कविता है. शाम से कुछ उदासी थी जो अभी तक ठहरी थी, इस कविता को पढ़ते हुए छिटकने लगी है. एक जोड़ी कबूतर मेरी छत पर भी रहते हैं. और कुदरत के रंगों को इस कविता के जरिये फिर से पढने की कोशिश कर रहा हूँ . अच्छा लग रहा है कि मूड बदल रहा या फिर शायद उदासी को आहिस्ता-आहिस्ता फेड होना ही होता है.

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  3. वाह …………भावो का सुन्दर सम्प्रेक्षण्……………बहुत सुन्दर कविता।

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  4. एकाएक भर जाता है आँखों में पीला रंग ..

    जमा-रुका सा कुछ मन में
    दस्तक देगा..

    खुले दरीचों में से दिखने लगेगी
    ..बसंत-बसंत..

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  5. waah....
    bahut din baad aaj blogjagat mein ghoom raha haoon...
    ek achhi kawita mil gayi padhne ke liye...

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  6. खुले दरीचों से दिखने लगेगी बसंत - बसंत
    उदासी भरे दिन कभी तो हटेंगे !

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  7. wat a optimistic approach ....onset of basant is welcomed in supbb way :)

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  8. वाह!सुन्दर रचना,

    "मेरे ख्याबों को खिल के रंगी कर गया,
    सुर्ख फ़ूल था फ़िज़ा बसंती कर गया!"

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  9. परदें हटाओ गर
    तो खिड़कियों पे..
    दिखती है खामोशी की परछाइयाँ..

    अच्‍छे बि‍म्‍ब खींचे हैं आपने

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  10. basant basant
    agar kuch achh lagta hai to andar se aawaj aati hai wah
    aur kisi ko aise hi bolna hota hai to bolte hai achha hai....

    par aaj fir se aawaj aai wah wah

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  11. डार परिंदों की निकलेगी बतियाते हुए..
    नज़र थिरकेगी हर शैय पे आते जाते हुए..

    गुनगुनी धूप सहलाएगी सारी फ़िज़ा को..

    जमा-रुका सा कुछ मन में
    दस्तक देगा..

    खुले दरीचों में से दिखने लगेगी
    ..बसंत-बसंत..

    लाजवाब कविता. बसंत का सम्मोहन है ही ऐसा. बधाई सुंदर लेखन के लिए.

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  12. जमा-रुका सा कुछ मन में
    दस्तक देगा..

    खुले दरीचों में से दिखने लगेगी
    ..बसंत-बसंत..

    सुन्दर...

    मौसम के साथ मन में भी फूलती बसंत....!!!

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  13. behad khoobsurat, wahh!! bohot bohot hi acchi nazm hai dimple, just amazing!

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  14. पहली बार आई पर आना अच्छा लगा बहुत खुबसूरत एहसासों से भरी खुबसूरत रचना |
    शुक्रिया दोस्त |

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  15. अहसास की चादर में लिपटी खूबसूरत रचना.....

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  16. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    http://vangaydinesh.blogspot.com/2011/03/blog-post_12.html

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...क्यूंकि कुछ टिप्पणियाँ बस 'टिप्पणियाँ' नहीं होती.