शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

कोमल कांपती..
ध्वनियों में बहती..
कानों में उतरती..
लबों पे थरथराती..
बीहड़ मन में
समा जाती सभी स्वर लहरियां..

अबूझ गीतों के अमिट भाव..
कुछ-कुछ शोकाकुल से..
मंद गति से खत्म होते-होते..
अचानक फिर से,
ऊँचे सुर पकड़ते..

शरीर और आत्मा
किसी अधम में तैरती...
शांत..
चेतनाशून्य..

तरंगे उठ रही है तब भी
बहरे कानो में..
सारंगी जबकि
टूट चुकी है अब कबकि..

10 टिप्‍पणियां:

  1. shuddh hindi hote hue bhi sufiana flavor hain is nazm mein...it out of this world yaara....beautiful :)

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  2. तरंगे उठ रही है तब भी
    बहरे कानो में..
    सारंगी जबकि
    टूट चुकी है अब कबकि..
    Aah....aisa asaliyat me na ho kabhi yahi dua hai!
    Rachana dil ke aarpaar utar gayee!

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  3. ये मेरे में ना एक अजीब-सी बीमारी...ऐसी हर कविता पढ़ने के बाद देर तक सोचता रहता हूँ कि लिखने वाले{इस केस में वाली} ने कौन-सी, कैसी मनःस्थिति, किस क्षण, कहाँ बैठकर, कैसे परिवेश में....वगैरह-वगैरह, लिखा होगा!
    बहरे कानों में और वो भी तब जब कि सारंगी टूट चुकी है, इन स्वरलहरियों का उठना...प्रेम की पराकाष्ठा जैसा कुछ?

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  4. आज डिम्पल के सपनो में उदासी क्यों? एक रचनाकार के तौर पर भावों को बखूबी निभाया है

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  5. चेतनाशून्यता को शब्दों का आधार।

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...क्यूंकि कुछ टिप्पणियाँ बस 'टिप्पणियाँ' नहीं होती.