बुधवार, 7 अक्तूबर 2009


मेरे रेत के घरोंदे,

हर रात कौन तोड़ जाता है??

अक्सर सोचती,

हर सुबह,

नया घर बनाते हुए।

आज सुबह,

तुम्हारे पाँव पे मिट्टी लगी हुई देखी.........

20 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. घर ले के आ गयी थी कातिल को...
    जान जिबह तो होनी हीं थी.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज सुबह,
    तुम्हारे पाँव पे मिट्टी लगी हुई देखी.........
    वाह क्या अन्दाज़ है. बेहद खूबसूरत.

    उत्तर देंहटाएं
  4. Oh my god!! Creation is rocking... Wonderful work by you Raj.

    Regards,
    Dimple
    http://poemshub.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  5. ओह!! बहुत उम्दा!! एक त्रिवेणी सा असर!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. बेहद खूबसूरत अंदाज़-ए-बयाँ.....

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाव ......... बहुत ही कमाल का लिखा है ....... लाजवाब अंदाज़ है .......

    उत्तर देंहटाएं
  8. तुम्हारे पाँव में मिटटी लगी देखी ...
    भावुक कर दिया आपकी रचना ने ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  9. समीर जी ने सही कहा है, ये एक त्रिवेणी ही है. कहने का अंदाज मगर उस शिल्प में नहीं है. सुंदर.

    उत्तर देंहटाएं
  10. Sometimes few words are more expressive....

    gharonde toot jaane ka itna dard aaj tak nahi hua jitna tumhare paav par lagi mitti dekh kar hua.

    -Sheena

    उत्तर देंहटाएं
  11. wow...Amazing one ...waah waah !!! great explanation in these few lines...

    उत्तर देंहटाएं
  12. आज सुबह,

    तुम्हारे पाँव पे मिट्टी लगी हुई देखी.........
    इन पंक्तियों मे लक्षणा के खूबसूरत प्रयोग द्वारा अपनी बात कहे बिना पाठक को सब कुछ समझा देने की यह अदा आ्पकी रचना मे एकदम नयी और अद्भुत लगी.
    और हाँ इन पंक्तियों का आशावाद और कर्मयोग भी
    हर सुबह,

    नया घर बनाते हुए।

    उत्तर देंहटाएं

...क्यूंकि कुछ टिप्पणियाँ बस 'टिप्पणियाँ' नहीं होती.