शनिवार, 4 दिसंबर 2010

बहती धारा के किनारों से..
सरकती जा रही थी,
दरख्तों की कतारें
धीरे -धीरे..

पनीले कुहासे में ,
डूबा चाँद,
जब-तब..
आँखों में झूलते पानी में
कैद हो जाता था..

पढ़ी-सुनी दुनिया से..
कितनी जुदा..
..कितनी सुंदर..
लगा करती थी
बारिश भीगी खिड़की के पार की दुनिया..

कोई ख्वाहिश नहीं थी..
कोहक़ाफ़ की घाटियों के हीरे-पन्नो की..
खुलने लगे थे अपने आप
चमकते ख्वाबो के दरवाज़े..
..सिम-सिम करके..

जादू के कालीन पे..
बादलों में उड़ना ..
कितना भला सा था...

ये बात और है कि...
मुझे नीचे उतरने की कला मालूम न थी...

44 टिप्‍पणियां:

  1. पनीले कुहासे में ,
    डूबा चाँद,
    जब-तब..
    आँखों में झूलते पानी में
    कैद हो जाता था..
    बहुत खूबसूरती से लिखा है ...

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  2. जादू के कालीन पे..
    बादलों में उड़ना ..
    कितना भला सा था...

    ये बात और है कि...
    मुझे नीचे उतरने की कला मालूम न थी..
    Oh wah! Kya gazab likha hai...khaas kar aakharee do panktiyan....jhakjhor detee hain!

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  3. एक बार ऊपर उड़ जाने के बाद नीचे क्यों उतरा जाये।

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  4. वाह डिम्पल जी शब्दों का चयन बहुत ही उम्दा ....
    कोई ख्वाहिश नहीं थी..
    कोहक़ाफ़ की घाटियों के हीरे-पन्नो की..
    खुलने लगे थे अपने आप
    चमकते ख्वाबो के दरवाज़े..
    सिम-सिम करके..
    लाजवाब...
    पहचान कौन चित्र पहेली ...

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  5. ये बात और है कि...
    मुझे नीचे उतरने की कला मालूम न थी..

    बहुत सुन्दर भाव भरे हैं।

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  6. सुन्दर भाव से भरा हुआ काव्य है|मेरी शुभकामनाये..

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  7. जादू के कालीन पे..
    बादलों में उड़ना ..
    कितना भला सा था...

    ये बात और है कि...
    मुझे नीचे उतरने की कला मालूम न थी.


    अच्छे भाव लिए ....... बेहतरीन रचना.. साधुवाद.

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  8. वाह!!!क्या नज़ारा है उससे बाहर आने को दिल ही ना नहीं करता

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  9. क्या कहूं। आपके साथ ही पूरानी यादों की घाटियों में चला गया। पढ़ते ही टिप्पणी नहीं दे पाया। कहीं भूला हुआ सा कुछ कहीं अंदर कुछ चटका हुआ याद आ गया। नीचे उतरने की कला तो मुझे भी मालूम नहीं थी। पर क्या करें चढ़ाने वाले ने ही उतार दिया। और हकीकत का धरातल इतना उबड़ खाबड़ था कि कई दिन लग गए संभलने में। पर चलिए यही तो जीवन है। कुछ कहां तलाश करुं और क्या करुं। मिलना तो वैसे भी नहीं है अब वो सुख।

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  10. ये बात और है कि मुझे उतारने की कला मालूम नहीं थी ...
    बहुत खूब !

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  11. us dost ka bahut bahut shukriya ...jisne aapko mere blog ka pata diya... jiski wajah se mujhe is blog ka pata chal gaya..... aapki kalam se nayi baaten khud ba khud ba nikalti hain... bahut hi pyari images banayi hai aapne...

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  12. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना मंगलवार 07-12 -2010
    को छपी है ....
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

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  13. ये बात और है कि...
    मुझे नीचे उतरने की कला मालूम न थी... .....Kya baat hai..kaun kambakht neeche utarna chahta hai :-) Sagar wala sawaal hamara bhi hai....meaning plsss

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  14. @sagar $ priya

    KohKaf is a narrow strip of mountainous region 1000 by 600 kms in size that lies between the Black Sea and the Caspian :)

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  15. dimple ji.....bahut khoob likha hai apne.....

    mere blog par bhi aye....

    http://rewa-mini.blogspot.com/

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  16. hey dimple...i just saw the moment, that u had been on my blog, and im so sorry i dint see it b4....aaj socha check karun ke ye blog maine kis tareekh ko shuru kiya tha...to aap wahan nazar aayin....thanks for ur words dear...aur ye bak bak aaj yahan isliye kar rahi hoon, taki aap mujhe 'how rude' na samjhein ;)

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  17. मैंने अपना पुराना ब्लॉग खो दिया है..
    कृपया मेरे नए ब्लॉग को फोलो करें... मेरा नया बसेरा.......

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  18. बादलों की सैर और ना उतरने की कला.. अच्छा लगा..

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  19. apne sapno ki duniya ka sair karane ke bbad ye likhna....

    मुझे नीचे उतरने की कला मालूम न थी...

    dil ko choo gaya...:)
    now follow ur blog!

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  20. बहुत ख़ूबसूरत भाव। मुझे कई बार शमशेर की भी याद आई। बहुत उम्दा।

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  21. Merry Christmas
    hope this christmas will bring happiness for you and your family.
    Lyrics Mantra

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  22. adbhut ji adbhut...
    bahut dino ke baad aana huaa ji aaj idhar...

    kunwar ji,

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  23. बहुत खूबसूरत एहसास है
    बेहतरीन

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  24. ओह...लाजवाब...

    भावों को कितने सुन्दर ढंग से अभिव्यक्ति दी है आपने...

    मन मोह लिया...

    बहुत ही मनमोहक रचना...वाह !!!!

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  25. बहुत ख़ूबसूरत डिम्पल...बहुत अच्छी कविता है...कमाल का एहसास दिलाती हुई...

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  26. एक सुंदर और सपनीला वातावरण सा रचती है पूरी कविता..ख्वाबींदा चांदनी से धुला..बारिश की मद्धम बूँदों के संगीत मे घुलता माहौल...सच है..बारिश भीगी खिड़की के पार की दुनिया बेहद खूबसूरत और सुकूनभरी लगती है..मगर कोई बूँद खिड़की पार कर हम तक नही आती..होश भी ऐसी ही खिड़की का शीशा सा होता है..जिसकी अदृश्य दीवार दो अलग-अलग दुनियाओं को जुदा रखता है...हमेशा!..मगर चमकते ख्वाबों के दरवाजों की चाबी हमारे इर्द-गिर्द ही होती है कहीं..हमारी बेखुदी की चादर तले छुपी कहीं..जो होश के हाथों से बार-बार फिसल जाती है...मगर वे ख्वाब भी पानी की सतह पर झिलमिलाते अक्स की तैरते रहते हैं नींद की नदी मे..कि हकीकत का हलका सा कंकड़ भी उन ख्बाबों की लय को तोड़ देता है...चांद भले ही पनीले कुहासे मे झूलते पानी की हदों मे कैद हो जाता है..मगर फिर भी पकड़ के बाहर ही रहता है..हमसे बहुत दूर..मगर आँखों मे कैद चाँद फिर पकड़ से कभी छूट भी नही पाता..तब उसके लिये आंखें ही आसमां होती हैं..और आंखें ही रात...और जादुई कालीन पर चढने वालों को नीचे उतरने की कला तो आती है..मगर बादलों के बीच उडना..ख्वाबों मे उड़ते रहना..भुला देता है सारी कलाओं को..मगर कालीन को नीचे तो आना ही होता है कभी..पेट्रोल खत्म होने पर रिफ़िल कराने के लिये :-)
    सुंदर कविता..हालांकि काफ़ी वक्त हो गया नयी कविता आये!!:-)

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  27. neeche utarne kee jaroorat kyo mahsoos hui

    aur ye main isliye kah rha hu kyoki abhi main khud upar chadhe jaa rha hu ...ab aapko padhkar ek warning mili h
    .
    khair
    पढ़ी-सुनी दुनिया से..
    कितनी जुदा..
    ..कितनी सुंदर..
    लगा करती थी
    बारिश भीगी खिड़की के पार की दुनिया..ye baat bilkul shi h ,

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  28. बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति ।
    हिन्दी को ऐसे ही सृजन की उम्मीद ।
    धन्यवाद....
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

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  29. डिम्पल (जी)...

    "जी" लिखने का मन तो नहीं था फिर भी लिख रही हूँ ..

    क्यों कि ये हमारा पहला परिचय है.

    शायद अगली बार न लिख सकूं तो माफ़ करियेगा....

    आज पहली बार "आपके सपने" देखे......

    और शायद आज ये मुझे भी सोने न दें....

    बड़ी देर से पढ़ रही हूँ-

    पर मन नहीं भरता!!!

    एक बार में ही "सारे सपने" देख गई !!

    फिर सोचा कि कुछ तारीफ करूँ जैसी कि सबों ने की है.....

    सबों को पढ़ भी डाला...

    पर शब्द ही नहीं मिले तारीफ में लिखने को..

    शायद "सब की सब नज़्म" मेरे दिल के बहुत करीब हैं

    और अपनी चीज़ की तारीफ करना मुश्किल होता है !!

    शायद आप मुझे माफ़ कर सकें...!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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  30. सुन्दर भाव से भरा हुआ काव्य है| धन्यवाद|

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  31. आपके कई पुराने पन्ने गायब हैं आपके ब्लॉग से..!!

    यदि आपत्ति न हो आपको तो पढ़ना चाहूंगी..!!

    क्या कारण है.......??????????????

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  32. बहुत सुन्दर अभिवक्ति एक बहुत ही उम्दा तरीके से ..अक्षरों के मोती ऐसे चुने की आपकी कविता एक बेशकीमती हार हो गयी... सादर

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  33. aapki kavita ghar ke chaar diwar ke andar padhne ke baad bhi aisa lagta hai main subah ke 4 baze samandar ke saamne baitha hun jiske aawaj joro se aa rahi hai ....aur wo sikh bhi rha hai halka halka sa...

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...क्यूंकि कुछ टिप्पणियाँ बस 'टिप्पणियाँ' नहीं होती.