शनिवार, 24 अप्रैल 2010

दिव्य स्वप्न

बिन नर्तक के नृत्य जैसा,
बिन गायक के गायन जैसा,
मधुर मिलन के,
दिव्य स्वप्न सा,
मुझसे मिलने य़े कौन आया था..

झड झड गये पीले पत्ते,
नई कोपलें देखी,
गुलमोहर के लाल फूल ,
और अमलतास के पीले..


बैसाख की तपती दोपहरी में,
नेह बरसा था बूंदों में..
पवन बसंती का इक झोंका,
इठलाया उसकी आँखों में..

बादल ,बिजली,
सूरज .चंदा,
सब था उसकी बातों में..

हाथ में गर्मी,
औस सी नरमी..
नजर की तितली,
टटोले चेहरा..
हाथ पे चुम्बन,
अब तक ठहरा..

आलिंगन से टूटी नींदे,
क्या जाने अब कितने युग,
इन स्पर्शो की स्मृति में बीतें..

24 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्यारी कविता, सुन्दर एहसास, कोई नुक्स नहीं... स्टेप टू स्टेप लिखा है... अंतिम पैरा काफी अच्छा है...

    जयशंकर प्रसाद की कविता याद आ गयी... सुन्दर

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  2. ये तो पूरी मौसमी रचना हैं ....समय बीत रहा हैं ना ....वक़्त के साथ यादें धुंधली होती हैं और नई यादें बनती हैं...फिर युग क्या ... भूत पर हमेशा भविष्य की गर्त के सिवा कुछ नहीं आता

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  3. सुबह हो गयी मामू.. :)

    सागर की पिछली टिप्पणी याद है इसलिये ये वाली पढकर थोडी हसी आ रही है.. :P खासकर ये पढकर कि कोई नुक्स नही.. :P

    "हाथ में गर्मी,
    औस सी नरमी..
    नजर की तितली,
    टटोले चेहरा..
    हाथ पे चुम्बन,
    अब तक ठहरा..


    आलिंगन से टूटी नींदे,
    क्या जाने अब कितने युग,
    इन स्पर्शो की स्मृति में बीतें.."

    बेहद रूमानी अहसास और काफ़ी अच्छे से पिरोये हुए..

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  4. बैसाख की तपती दोपहरी में,
    नेह बरसा था बूंदों में..
    पवन बसंती का इक झोंका,
    इठलाया उसकी आँखों में..

    बादल ,बिजली,
    सूरज .चंदा,
    सब था उसकी बातों में.. dil ko choo liya...abhar is rachna ko prastut karne ke liye...

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  5. bahut hi achhi rachna....
    bilkul hi mann ko chhu lene wali...
    aapko padhna achha lagta hai, yun hi likhte rahein...
    regards...
    mere blog par v aayein, ek nayi kavita...
    intzaar........

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  6. आलिंगन से टूटी नींदे,
    क्या जाने अब कितने युग,
    इन स्पर्शो की स्मृति में बीतें....केवल ये शब्द ही रचना मै पराये नज़र आते है और जो कुछ आपने लिखा वो तो गजब का लिखा है इस तरह सपनो का वर्णन खुली आँखों से देखने वाली कर सकती है या तुलसीदास जी जैसा कोईएक

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  7. सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।

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  8. आलिंगन से टूटी नींदे,
    क्या जाने अब कितने युग,
    इन स्पर्शो की स्मृति में बीतें.
    .......वाह क्या बात है !!!!

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  9. बैसाख की तपती दोपहरी में,
    नेह बरसा था बूंदों में..
    पवन बसंती का इक झोंका,
    इठलाया उसकी आँखों में...

    SUNDAR SHABDON SE RACHI ... MADHUR BHAAV LIYA RACHNA ...

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  10. वाह, सागर साहब को पसंद आयी जान कर अच्छा लगा..मगर हमें तो खूब मज़ा नही आया...कविता गीत-अगीत होने की कोशिश मे बीच मे कुछ भ्रमित सी रह जाती है..शुरुआत लयात्मक मगर बीच मे पटरी से अतिक्रमण करती सी लगी..खैर यह अपनी कच्ची समझ के आधार पर कह रहा हूँ..मगर अतिंम पंक्तियाँ पसंद आयीं..और पसंद आया साथ का चित्र..इतनी बड़ी तितली जो नही देखी कभी ( या कहें इतना छोटा पेड़) :-)

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  11. Hello Dimple :)

    "नजर की तितली" -- Wow! What an imagination and beautiful thoughts :)
    I loved the way you have been writing so consistently on different subjects.
    It is a good composition.

    Wonderful.
    Regards,
    Dimple
    http://poemshub.blogspot.com

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  12. आलिंगन से टूटी नींदे,
    क्या जाने अब कितने युग,
    इन स्पर्शो की स्मृति में बीतें..

    बहुत बेहतरीन प्रस्तुती. मन के भाव कितनी सहजता के साथ सामने आये है जैसे की बहता हुआ पानी. चाहें आँखों से या जल स्रोत से.

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  13. हाथ में गर्मी,
    औस सी नरमी..
    नजर की तितली,
    टटोले चेहरा..
    हाथ पे चुम्बन,
    अब तक ठहरा.
    Bahut ,bahut hirday sparshi!

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  14. "थोडा सा रूमानी हो जाये....."


    हिंदी में रोमांटिक होना उर्दू की अपेक्षा मुश्किल है ......

    हम तो इसे दिल से लिखा मान कर अपनी प्रेसेंस लगा कर जा रहे है रजिस्टर में ......

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  15. छू दिया
    अनहद हुआ ।
    उत्कृष्ट अनुभूति की रचना ।

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  16. आलिंगन से टूटी नींदे,
    क्या जाने अब कितने युग,
    इन स्पर्शो की स्मृति में बीतें..

    tumhe kabhi bhool na payege, yeh kehne ka andaaz bahut hi badiya hai

    -Shruti

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  17. thanx 4 ur comment .
    आलिंगन से टूटी नींदे,
    क्या जाने अब कितने युग,
    इन स्पर्शो की स्मृति में बीतें..

    luv these lines very touchy poem .

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  18. हाथ में गर्मी,
    औस सी नरमी..
    नजर की तितली,
    टटोले चेहरा..
    हाथ पे चुम्बन,
    अब तक ठहरा..

    आलिंगन से टूटी नींदे,
    क्या जाने अब कितने युग,
    इन स्पर्शो की स्मृति में बीतें.. aapne to aparsh ko jeewant kar diya.aap bahut achha likhti hain dimple!thanx for visiting n folowing my blog.

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  19. अब सागर ने कुछ छोडा हो तो लिखेँ भी.........
    jokes apart.... बडी सुन्दर रचना है

    satya

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  20. सुना नाम , तो लिया पता,
    दौड़ी आई
    दिल से निकला---
    वाकई तुम कौन?
    बहुत ही अच्छी रचना

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  21. हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

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  22. मैं चिटठा जगत की दुनिया में नया हूँ. मेरे द्वारा भी एक छोटा सा प्रयास किया गया है. मेरी रचनाओ पर भी आप की समालोचनात्मक टिप्पणिया चाहूँगा. एवं यह भी जानना चाहूँगा की किस प्रकार मैं भी अपने चिट्ठे को लोगो तक पंहुचा सकता हूँ. आपकी सभी की मदद एवं टिप्पणिओं की आशा में आपका अभिनव पाण्डेय
    यह रहा मेरा चिटठा:-
    **********सुनहरीयादें**********

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