शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010


क्यूँ न चुरा पाए वो पल..
के मिलना न लगता इक ख्वाब..
हालाकि तब भी ख्वाब लगा,
और अब भी..

टेबल पे गिरा पानी,
अनछुए सैंडविच,
यूँ ही पड़े फ्रेंच फ्राइज़
भाप उड़ा उड़ा  के आखिर ठंडी हुई कॉफ़ी,
और गर्म होते जूस,
सब यू ही पड़े थे,
और जाने का वक़्त भी आ गया?

ऐसे कैसे?

टेबल पे पड़ी चीजों के साथ मैं भी वही रह गयी,
तुम्हारी यादो के साथ..
कहाँ लौट पाई वहां से..

चीज़े भी कैसी होती है न..
अभी थी अभी नहीं..

तुम मुझसे और मैं..
मैं भी तुमसे..
मिलना चाहते थे गले..
..पर..
पर सिर्फ हाथ मिलाये हमने..

जानां..
सुनो...
सुनो न...
चलो न इक बार वापिस चले..
वो सैंडविच ,वो कॉफ़ी
ठन्डे हो जायेंगे..
उनकी खातिर चलो न..
रेस्तरां का कोना सूना होगा..
चलो न उसकी खातिर चले..

अच्छा ठीक है..
कुछ भी कह लेना मुझे.
शोना..
बिट्टू..
और बकवास इंसान भी...
पर इक बार चलो फिर से वहां..

27 टिप्‍पणियां:

  1. Badhiya Abhivyakti ! Wapis Aata Hoon.

    :)

    उत्तर देंहटाएं
  2. कोमल सी अनुभूति ....... स्मृतियों को सँजोती ...सपने देखती हुई ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. bahut khub

    shandar kavita


    shkaher kumawat
    http://kavyawani.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut khub...
    bas yaad saath hai....
    achhi rachna ke liye badhai ho..
    mere blog par is baar..
    नयी दुनिया
    jaroor aayein....

    उत्तर देंहटाएं
  5. रेस्तरां का कोना सूना होगा..
    चलो न उसकी खातिर चले..
    बेहतरीन रचना के लिये साधुवाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. टेबल पे पड़ी चीजों के साथ मैं भी वही रह गयी,
    तुम्हारी यादो के साथ..
    कहाँ लौट पाई वहां से..

    टुकड़ों में बिखर हुआ वजूद, जाने कहाँ कहाँ छूट जाया करता है. याद की जुगाली मौसम के साथ नहीं होती वरन आदत बन के बैठ जाया करती है. किसी चौपाये की पीठ पर जंगली परिंदे की तरह लौट लौट आती है हर बार छिटक जाने के बाद भी.

    उत्तर देंहटाएं
  7. hamara comment kahan hain? kal hi de diya tha hamne is post par.....aapne publish nahi kiya :-)

    उत्तर देंहटाएं
  8. स्पष्ट रूप से मैं निराश हुआ हूँ.... विगत तीन कविताओं में काफी सुधर दिखा था... ना यहाँ मुझे कंटेंट नज़र आ रहा है ना ही कोई शिल्प ही... ऐसा कमेन्ट बुरा लग सकता है पर आपने न्याय नहीं किया इसके साथ मैं यह कह सकता हूँ...

    कोई और रास्ता तलाशिये

    उत्तर देंहटाएं
  9. @Dimple kiya tha...may be kuch technical fault ho @ sagar shilpgat kamiyon ki baat karein to ho sakta hai .....Lekin content ka na nazar aana mujhe nahi samajh aaya....Ye khoobsoorat content hi to kavita ki jaan hai aur bakhoobi deliver kiya hai dimple ne apne thought ko .....Haan shilpgat waali baat to sweekar sakte hain ham

    उत्तर देंहटाएं
  10. मुझे वो गज़ल याद आ गयी -
    "न जी भर के देखा, न कुछ बात की।
    बडी आरजू थी, मुलाकात की.."

    आपने अपना जो स्टैन्डर्ड बना दिया है, उस लिहाज से सागर की शिल्प वाली बात से सहमत हू लेकिन किसी ने यह भी तो कहा है कि -

    "किन लफ़्ज़ों में अपनी बात लिखूं? ग़ज़ल की मैं तहज़ीब निभाहूँ , या अपने हालात लिखूं?"

    शिल्प के नाम पर तो हम हमेशा ’कविता सा’ ही लिखते है और ’आज़ाद नज़्मे’.. कभी ऐसा ही कुछ यहा लिखा था..

    उत्तर देंहटाएं
  11. तुम मुझसे और मैं..
    मैं भी तुमसे..
    मिलना चाहते थे गले..
    ..पर..
    पर सिर्फ हाथ मिलाये हमने..

    बेहद महीन अनुभूति को दर्शनीय बना दिया आपने
    कविता की नवीनता बांधती है और चित्र....

    कुछ बातें शायद शब्दों से पर होती हैं

    उत्तर देंहटाएं
  12. is post ko pad kar hi lagta hai ki wo ehsaas ab tak zinda hai.. bikhri hui chheezo ko abhi tak sameta nahi hai.. bas isi umeed mein ki wo wapis aayega ya hum khud hi use wapis le kar jayege...

    Dimple is baar phir dhoond nikala hai tumne ek chhupa hua ehsaas.

    -Shruti

    उत्तर देंहटाएं
  13. आपकी कविता बहुत ही अच्छी लगी ... भाव लिए ....

    उत्तर देंहटाएं
  14. काव्य , शिल्प , कथ्य , बुनावट
    सभी कुछ तो नज़र आ रहा है
    टेबल , जूस , कोफी , खान-पान
    वो लम्हे , आप और मेहमान
    सभी अपने-अपने-से लग रहे हैं
    हर शब्द ...
    मानो दर्पण में निहार रहा है खुद को
    अब क्या कहूं ...
    "भगवान् का आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ रहे"
    काफी रहेगा ना ....!!

    उत्तर देंहटाएं
  15. कुछ नम हवाये
    बार बार खींच लेती है
    मन को अपनी शीतलता मे !

    उत्तर देंहटाएं
  16. मै भी ओम जी साहब के साथ खर्चा-पानी साझा कर सकता हूँ (हालांकि ज्यादा तो वही पे करेंगे..बड़े होने के नाते)..अगर उनकी दर्ख्वास्त मानी जाती है तो..

    उत्तर देंहटाएं
  17. bhavnayo ko vistar diya hai aapne...poetry nahi ye feelings hai..

    उत्तर देंहटाएं
  18. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  19. मैं चिटठा जगत की दुनिया में नया हूँ. मेरे द्वारा भी एक छोटा सा प्रयास किया गया है. मेरी रचनाओ पर भी आप की समालोचनात्मक टिप्पणिया चाहूँगा. एवं यह भी जानना चाहूँगा की किस प्रकार मैं भी अपने चिट्ठे को लोगो तक पंहुचा सकता हूँ. आपकी सभी की मदद एवं टिप्पणिओं की आशा में आपका अभिनव पाण्डेय
    यह रहा मेरा चिटठा:-
    **********सुनहरीयादें**********

    उत्तर देंहटाएं

...क्यूंकि कुछ टिप्पणियाँ बस 'टिप्पणियाँ' नहीं होती.