गुरुवार, 3 नवंबर 2016

जब हम एक दूसरे  के अभ्यस्त हो चले थे 
तब उस वक़्त दुनियां में शांति थी 
ज़मीन कहीं नहीं बची थी
 तृप्त आसमान फैला हुआ था 
वो भी मेरी ही तरह तुम्हारे आने की बाट  जोहता 
रात्रि- कार  के अनुभव से शायद 
वो बताता कि  जाने वाले लोट आते हैं 
जो बातें  तुम बता कर जाते वो मुझे फिर-फिर सुनाता 
काश कि  मुझे भी वो सब याद रहता 
जो मैंने सुना नहीं 
तब शायद मैं अनंत काल तक तुम्हें सुन सकती 
हम इतने आदी  हुआ करते थे एक दूसरे  के 
या तो हम रात- रात भर बातें करते 
या फिर दिन भर भी चुप रहते 
और मुट्ठी भर यादों की तह लगाते रहते 
बहुत समय तो नहीं हुआ था 
फिर तुमने ऐसा क्यों कहा 
कि  अब हमें चलना चाहिए  .... 



1 टिप्पणी:

  1. आपकी कविता मैं कभी कविता के लिए नहीं पढता हूँ , वो तो बहुत लोग करते हैं | आपकी कविता पढ़ने का असली मकसद वो एहसास महसूस करना होता है जो शायद रोजमर्रा की जिंदगी में होकर भी अनछुआ रह जाता है |
    इस बार भी वो एहसास भरपूर मिला है |

    सादर

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