मंगलवार, 3 जनवरी 2012

उठता है..
.. हरे किनारों से..
और..
रूह तक उतर जाता है..
ये जो रुई के फाहों सा..
घना कोहरा..
सड़क के दामन में भरा रहता है..
..ज़मी कांपती है हौले-हौले..
निगाह हुई जाती है धुंध-धुंध..
पलक झपकता है..
ऑंखें मलके..
..ऊंघता सूरज..
भीगे घर दुबक के सोते है..
...कहीं से चाय का गुमसुम..
धुआं सा उठता है..
...गुम हो जाता है..
...शबनमी हवा में..
ऐसे में...
इस ख्वाबगाह से गुजरते हुए..
अक्सर तेरी याद बहुत आती है...

14 टिप्‍पणियां:

  1. यादें उपालंभ का आश्रय पा सजीव हो उठती हैं
    सुन्दर रचना

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  2. चाय ओर तुम दोनों में अब भी अब भी रिश्ता कायम है ......हम दोनों की कुट्टी होने पर भी

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  3. शब्द शब्द बेजोड़ रचना...बधाई
    नीरज

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  4. मौसम का धुंध और स्मृति का खुलापन..

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  5. गुनगुनाती रातों में
    निढाल होती यादें..
    भूले-भटके मोड़ पर
    लौटकर आती यादें
    माँ के किस्सों में
    पनाह मांगती यादें
    वक़्त-बेवक्त दामन पर
    दाग लगा जाती यादें
    चुप रहने की आदत में
    सब कुछ कह जाती यादें
    तेरे चेहरें की शिकन में
    रोती-हंसती यादें
    ग़ुरबत की चादर में
    खामोश सी यादें

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  6. ..कहीं से चाय का गुमसुम..
    धुआं सा उठता है..
    ...गुम हो जाता है..
    ...शबनमी हवा में..
    ऐसे में...
    इस ख्वाबगाह से गुजरते हुए..
    अक्सर तेरी याद बहुत आती है...

    सुन्दर रचना !

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  7. ...कहीं से चाय का गुमसुम..
    धुआं सा उठता है..
    ...गुम हो जाता है..
    ...शबनमी हवा में..
    ऐसे में...
    इस ख्वाबगाह से गुजरते हुए..
    अक्सर तेरी याद बहुत आती है...
    Bahut sundar,bahut komal!

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  8. ऑंखें मलके..
    ..ऊंघता सूरज..
    भीगे घर दुबक के सोते है..
    ...कहीं से चाय का गुमसुम..
    धुआं सा उठता है..
    ...गुम हो जाता है..
    ...शबनमी हवा में..
    ऐसे में...
    इस ख्वाबगाह से गुजरते हुए..
    अक्सर तेरी याद बहुत आती है...

    alfaaz ki kami hai yahan....
    bas....
    yaad hi baki hai...

    khoobsoorat...

    उत्तर देंहटाएं
  9. कहीं से चाय का गुमसुम..
    धुआं सा उठता है..
    ...गुम हो जाता है..
    ...शबनमी हवा में..
    ऐसे में...
    इस ख्वाबगाह से गुजरते हुए..
    अक्सर तेरी याद बहुत आती है.
    achchha likha aapne, khas tour pe ye lines khas pasand aayin.

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  10. जब चाय के भगोने पे रखा ढकना,
    जब पानी उबलने का सायरन बजाता है|
    मैं अपने प्यार के मिठास की चीनी,
    और तुम्हारे प्यार की पत्ती,
    दोनों डाल देता हूँ,
    ज़िंदगी का रंग उभर आता है....

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  11. इतना कुछ इस तरह से घट रहा हो तो याद आना तो बनता है. लाजवाब प्रस्तुति

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...क्यूंकि कुछ टिप्पणियाँ बस 'टिप्पणियाँ' नहीं होती.