रविवार, 29 जनवरी 2012

लो लिख दिया..

 १ 
सफेद दुपट्टे पर...
जरा-जरा सा..
फालसा किनारा..

...एक लम्बी कविता को ..
...लिखने के बाद ..
काटे हुए ..
..गैरजरूरी..
शब्दों जैसी..

...पलकों में बंद..
...शबनम जितनी..

..मैं..
तुम्हारी पूरी ज़िन्दगी का..
एक बहुत ही छोटा सा हिस्सा भर हूँ..
************************************
 सुनो..

गिरी पड़ी..
किताबों को..
..जब सही जगह रखो..
उनसें गिरा कोई..
खत..
मिले तो..
..फिर न पढ़ना..

मेरा नाम..
गर लो...
तो होंठों पर उंगली रखना..

बताओ !
क्या तुम्हें पता है..
सितारे टूट कर..
सच्ची में नहीं गिरा करते..
दुनिया में..
किसी जगह..
सपनें भी नहीं उगा करते..

मैं जानती हूँ..
भले ही देखूं..
आखरी माले से..
आसमां..
दूर नज़र आएगा..

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

उठता है..
.. हरे किनारों से..
और..
रूह तक उतर जाता है..
ये जो रुई के फाहों सा..
घना कोहरा..
सड़क के दामन में भरा रहता है..
..ज़मी कांपती है हौले-हौले..
निगाह हुई जाती है धुंध-धुंध..
पलक झपकता है..
ऑंखें मलके..
..ऊंघता सूरज..
भीगे घर दुबक के सोते है..
...कहीं से चाय का गुमसुम..
धुआं सा उठता है..
...गुम हो जाता है..
...शबनमी हवा में..
ऐसे में...
इस ख्वाबगाह से गुजरते हुए..
अक्सर तेरी याद बहुत आती है...

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011


नहीं कोई उम्मीद ..
नहीं..कोई अपेक्षा नहीं..
फिर भी कुछ ऐसा...
 जो अच्छा है..
.कितना कुछ है हममें ..
और कुछ भी नहीं..
एक बार..
 ले चलो वहां...
... जहाँ काशनी फूल खिले हो...

..जहाँ हवा बहे तो महसूस हो....
 इत्मीनान हो..
कुछ जरा आराम हो...
जहाँ  ख्वाबों की मूर्त ना हो धुंधली ..
...बसंत के दिन ..
पतझड़ की तरह हो ठन्डे ..
खामोशी की तहें बिछी हो..
बंद करदे शोकगीत गाना..
रात का वो..
अकेला पंछी..
तब..
तुम्हारी सांसों के पत्ते
अचानक से गिरे..
तोड़ दे मेरे मौन को..
मौन...
... स्याह रात के अँधेरे सा मौन..
रुको नहीं ..
कुछ कहते-कहते..
थकूं नहीं मैं सुनते-सुनते..
हलचल हो बस इतनी..
पानी में कंकर जितनी..
ले चलो वहां..

जहाँ...

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

बिल्कुल सीधे चलना सड़क के  मोड़ तलक....
फिर दायें...
...कि जैसे गली जुडती  है वहाँ,
वो जगह,
जहाँ गली के दोनों तरफ़ अशोक ...
बुतों से खड़े हैं,
वही पे धूल भरा...
...सामने का पहला मकां.
कि अब यही पहचान है उसकी कबसे,
गोया इंतज़ार कर रहा है बीते कई सालों से..
थोड़ा आगे..
किसी झरोखे में मद्धम सा दिया...
टिमटिमाता है सवेरे की अलसाई सी रोशनी में...
यूँ कि इक नज़र  उनीदीं आँखों की झाँक रहा हो उचक उचक के झरोखें से,
सुबह की पहली चाय से पहले उठा जो...
दिन भर फिर ऊँघता ही रहा...

एक मकान आम अमरूदों  के दरख्तों से घिरा...
चहचाहाता है सुबह होते ही,
चहचाहाता रहता है शाम होने तलक...
उसे ये  नाज़ है कि 
ज़िन्दगी बसी है तो बस उसी के घोंसलों में...
...वो एक मकान जो के घोसलों से मिल के बना है.
एक शर्मीला सा मकान अपनी ही बेल बूटों में छिपा.
घबराया सा...
सुबह पहली किरण से जाग जाता है...
 सुनहरी मकान ...
गली की आखिर में...
एक मकान बड़ा उदास सा है..
मन्दिर के बाहरवार..
..लकड़ियों की सीढ़ियों के ऊपर..
जरा झुका सा छज्जा..
गालों पर हाथ टिकाये..
..सोचता रहता हरदम..
...आम के बाग के पीछे...
गिरने को है जो मकान...
..अपने गुज़रे हुए कल लिए
बोने वाले की नीयत या मौसमों की मेहरबानी...
उसके आंगन के गुलाब अभी..महकते है...
ये मकान  कुछ भी तो बोलते नहीं...
फिर भी कुछ न कुछ कहते है...

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

कभी शदाय सा उठता है..
वक़्त को ले थाम..
छुपा ले निशानियाँ थोड़ी..
कहीं कुछ तो बचा ले..
धड़ाम-धड़ाम गिरती सभी सोचें..
..नर्म नाज़ुक रही होंगी...
तलवे जल जाया करते थे कभी..
बोच-बोच पैर  जब चला करते थे...
..अंगार अब नहीं बचे सुर्ख ईटों में..
...और तपिश सूरजों की भी हुई ठंडी..
एक पूरा महीना हुआ करता था बरसातों का..
...कच्ची छत की मिट्टी बहा करती थी परनालों से..
..बस...आज दीवारें ही बच पाएंगी..
छतें पक्की हुई कब की...
अब तो बरसातें भी छोड़ देती है.
कभी -कभी एक घर सूखा..
उन दिनों पलाश भी
कुछ इस तरह झड़ा करता था..
..सारी आंधियां मानो चली हो उसी पर...
वक़्त ने पूर दिए सब के सब कुएं..
..हर नक्शे में ढूंढा उसे..
जिसकी दीवारों से उगा करते थे नन्हें पीपल..
एक पलाश...पुर चुका कुंआं...और एक कच्ची छत..
वक़्त गुजर रहा है...
और...
एक दिन हम भी गुजर जायेंगे...
..आर-पार...


रविवार, 25 सितंबर 2011

यह एक कविता है..
एक साधारण कविता..
कविता काल्पनिक भी है..
..हालाँकि नाम वास्तविकता के कुछ करीब हो सकते है..
पर पात्र कविता की तरह साधारण ही है..
सोना..
..सोना खुद रोती है..किसी बडे अफ़्सोस् जितना।
पर दादी के आंसू नहीं पिघला पाते उस बर्फ को..
जाने क्यों इतनी जिद्द..
पूरे खुले शीशे को और खोलने की.
भूल जाती है या खो जाती है..
कॉरिडोर में..
देर बाद लौटती है..
..वो भी बिना पिए पानी..
उसे पता नही चाहिए क्या..
देर तक देखती है..
रेलिंग पर बैठे कौओ को..
फेंक देती है उनके आगे सारा खाना..
नही नही..
भूखे नही रहती..
वह तो..
छीन लेती है किसी और से..
उलझती रहती है आढ़ी टेढ़ी चन्दरी रूहों सी रेखाओं में..
भर देती है कागज़ गोल लाल बिंदियो से..
..इस दिसम्बर आठ साल की हो जाएगी..सोना..
चार साल से नही मिली माँ से..
पर बताती है..
उसे याद है अभी तक उसकी..
और जब याद आती है तो बहुत याद आती है..
.....................................
सोना की सूरत पापा सी नही है..
पर दोनों ही कभी किसी को नही दिखे....
मुस्कराते हुए...

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

ये इतना आसान नहीं होगा...
नज्मों में मेरा अब से नहीं होना...
....तुम्हें पहले से ज्यादा ध्यान रखना होगा..
कवि कहीं ये बात भूल नहीं जाये...

कवि को चेताते रहना..
आखरी पुल से गुजरते वक्त..
उस तरफ़ नहीं देखे
जहाँ मैं और तुम खड़े सोच रहे थे
...अब किस तरफ़ जाये...

मोल भाव किये जामुन..
रास्ते में नहीं भूल जाये...
लेकिन मोहन पार्क की सीढ़ियों से...
निशान मिटाना याद रखे...

रास्तों को पार करते हुए..
दोनों तरफ़ देखें..
ये जरुरी है...
जहाँ भीड़ ज्यादा है ..
वहां कुछ बुरा ही हो..
ये जरुरी नहीं...

सिर्फ़ छूई-मुई को पानी देते हुए
ध्यान रखे...
सभी पौधे छूई-मुई नहीं होते..
पर हर छूई-मुई छूई-मुई होती है...

फिर भी अगर उसकी नज्मों में..
मैं थोड़ा बहुत रह जाऊं ...
तो कवि से कहना...
....चल हऊ कर दे...

बुधवार, 8 जून 2011

पता नहीं क्यों..आपसे कितना भी चिढ जाऊं..पर आपकी बात ना मानूं ऐसा नहीं कर पाती..आपने कहा था डायरी लिखूं...नहीं लिखना चाहती थी...फिर भी ....दुनिया बदल जाना किसे कहते है..मैंने अभी जाना नहीं था..एक दरवाज़ा बाहर की तरफ़ खुलता था ..एक अंदर की तरफ़..सामान उतारा जा चुका था..गाड़ी धूल की लकीर अपने पीछे छोड़ती हुई जाती दिखी...जी चाहा भाग के धूल का एक छोर पकड़ लूँ..पर..मैं अपनी जगह से हिली तक नहीं..ना बाहर जाने के लिए ना अंदर जाने के लिए..सब मेरी जानकारी में
मेरी मर्जी से हो रहा था..फिर भी मैं हैरान थी...मुझे पता नहीं ..मैंने कब अंदर जाने वाला दरवाज़ा खोला..दुनिया,बदल जाना मैंने जान लिया था..एक भी ऐसा चेहरा नहीं जिसे मैंने पहले देखा हो.ऐसी कोई भी आवाज़ नहीं जिसे पहले सुना हो..मैं वहां क्यों थी..मुझे वहां नहीं होना चाहिए था..मैं अपना भला बुरा नहीं जानती ..ना जानना चाहती हूँ......रेलिंग पर खड़े हुए सूर्य अस्त को देखती रही ..कितना बुरा लग रहा था उसका यूँ चले जाना..जाने कब आंसू बहने लगे कब हिचकियाँ बंध गयी..मुझे कुछ पता नहीं कितनी आवाज़े मुझे बहला रही थी..मैं किसी को नहीं जानती..मैं किसी को जानना भी नहीं चाहती..
मैं कुछ सुनना नहीं चाहती..मुझे यहाँ नहीं रहना..मुझे बस लौटना है अपनी दुनिया में..घंटो रो लेने के बाद मैं चुप थी..पर उदास..बेहद उदास....एक रात..एक सुबह..एक दोपहर ..कुछ ना खाने के बाद मैंने जाना भूख किसे कहते है..सूर्य  फिर जा रहा रहा..मैं गीली आँखों से उसे देखती रही..मुझे यहीं रहना है..मैंने आँखे उठा के सब और देखा..चेहरों को पहचानने की कोशिश की..पहले माले से चौथे  माले तक की सीढ़ियों को गिना..
कॉरीडोर में पड़े गमलो में पौधो को छुहा..खाना भी खाया......मैं वहाँ थी जहाँ मुझे नहीं होना चाहिए था..पर आप कहते हो कि वहीँ होना चाहिए था..आपकी बात मना नही कर सकती....

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

ख्वाबो की गुलाबी दीवारें

 दीवार पर खिसकते हमेशा सूरज के बस में रहने वाली धूप के टुकड़े की तरह दिन धीरे-धीरे खिसक रहे है.रातें और ज्यादा खामोश हो जाएँगी.कोई किताब खत्म करके यूँही टकुर-टकुर इन दीवारों को ताका करूंगी.धरती आस्मां की तरह ये दीवारे यंही रहती है बस देखने वाली नज़रें बदलती रहती है.
गुलाबी रंग..क्या इन्हें भी पसंद होगा? कहीं इन्हें पीला रंग तो नहीं पसंद.कौन पूछता है दीवारों की मर्जी..ये बताती भी कहाँ है.बरसो बरस मौन खड़ी  रहती है इनके बस कान होते है ज़ुबां कोई नहीं.बस पुरानी दीवारों पर कुछ धुंध-धुंध चेहरा उभर आते है दिन चड़े वो भी भूल जाता है.नया रंग अपनी तहों में सब कुछ छुपा लेता है.कोई पहरा नहीं इनपर फिर भी कहीं आती जाती नहीं खुद पे खुद ही अंकुश लगाये रहती है.बना लो तो बन जाती है गिरा दो तो गिर जाती है..जहाँ-तहां तस्वीरें लगा दो..कोई रोष नहीं..प्रतिवाद नहीं..एक रंग के सिवा कुछ भी तो नहीं बदलता..वही दरवाज़े,वही खिड़कियाँ,वही तस्वीरें....
परछत्ती पर रखी एक-एक याद को,टूटी-फूटी कहानियों को,अधूरे फालतू छुपा के रखे ख्वाबो को झाड़ पोंछ कर देखूंगी जब तुम नहीं...
(ख्वाबो और किताबों की गुड़ती ही मिली है मुझको)  मैं उस दिन का तस्सवुर नहीं करना चाहती जब तुम...
तुम बेशक चले जाओगे पर मेरे पास भी उतना ही रह जाओगे...

तुम भी मुझे याद किया करोगे..हर वक़्त नहीं पर कभी तो सोचोगे..कहोगे पर कुछ भी नहीं..कुछ बातों के लिए शब्दों की जरुरत नहीं होती..यूँ भी पहाड़ तो मौन ही रहते है.पथरीले सूखे....पर जल का निर्मल कोई सोता तो उनके अंदर भी बहता रहता है..तुम मेरी हर जिद्द मान लेना चाहते हो पर कठोर बने रहते हो.हर बार यही कहते हो,"तुम बहुत फरमाइशी हो गयी हो.ये आखरी जिद्द है इसके बाद कोई जिद्द नहीं मानूगा."ज़ी चाहता है फिर से जिद्द करूं ...मत जाओ...पर बादल साया बनके हमेशा कब रहते है..जब तक बरसोगे मैं बारिश में सराबोर रहूंगी...


रविवार, 27 मार्च 2011

कहाँ तलाश करूँ? जाने किसे?

हसीन ख्याल,
अजाब-ए-जान बन जाते हैं.
ख्यालों की छाया को वर्कों पे उतारने का मन होता है.
पर एक भी पन्ना खाली नहीं मिलता...

चाँद,
कभी शरमाया हुआ
कभी सोगवार नज़र आता है.
बादल चाँद को कभी छुपा लेते हैं और कभी बाँहों से निकाल कर देखने लगते हैं.

तेज़ हवा,
पत्तों से टकराती हैं तो उदास सी आवाज़ हो आती हैं.
ऐसे में,
खिड़की के बाहर,
शाम की रोशनी के ख़त्म होते ही,
पेड़ों पे बिखरी-लिपटी बेलें मासूम सी नज़र आती हैं.
तुमसे किस मौसम की बात छेड़ दूँ ?
कि बिन मौसम के मौसम की बात भी नहीं की जा सकती.
है न?

परिंदा,
अकेला...
डाल से बिछड़ा,
फिर भी,
कानों में आसमानी मौशिकी घोलता है.
नपी तुली आवाज़ में,
जाने क्या क्या भविष्यवाणी करता है?
ज़ल्दी-ज़ल्दी से चोंच में दाना लिए
कहीं दूर से उड़कर आता है.
घास के तिनकों की नरमी में इश्वर की ख़ुश्बू बसी होती है.

रसोई,
खुली हवादार जाली की खिड़कियों वाली है.
मेरी पीठ पीछे चाय उबल कर बह चुकी है और चाय पीते हुए,
कुछ याद नहीं होगा
...चाय बनाते वक्त क्या सोचा था?
ऐसा कोई विकल्प नहीं है कि ड्राफ्ट सहेजे गए हों.

एगज़ोज्ट-फैन,
बरसों से ख़राब है,
कभी न उसे ठीक कराने की ज़रूरत पड़ी न बदलने की.
बस अपने हिस्से की जगह घेरे है अपने होने का एहसास लिए.

तुम,
आँखें बंद करके लेटे हुए सुनते रहते हो,
मेरे दिनभर की जमा बातें.
फासलों की ख़ामोशी में मेरी आवाज़ तब तुम तक नहीं पहुँचती,
जब तुम कई बार सो जाते हो...
या नज़र बचा के साथ पड़े लैपटॉप को रिफ्रेश कर लेते हो.
मेरे पूछने पर कहते हो,
"कहाँ? मैंने तो इधर देखा भर बस,
सुन तो तुम्हें ही रहा हूँ."
जाने कैसे बही-खाते है जो सारा दिन लैपटॉप पे झुके पढ़ते रहते हो?
हालाँकि छत पे पहले से ज्यादा धूप रहती है, पर,
धूपों का मौसम अब जा रहा है,
उदासी भरी 'दोपहरें' पाँव पसार रही हैं.
अचानक से कोई 'वावरोला' उठता है और सारी सोचों को दरहम-बरहम कर जाता है.

किसी किताब के पन्ने,
पलटूं भी तो कितने?
पात्र किताबों से निकलते चलते चलते मेरे मन में दुनियाँ बसाने आ पहुंचे हैं.
काल्पनिक पात्र सच और असली बे-यकीनी होकर छलते रहे हैं.
कभी किताब से वो बाहर नहीं निकलते तो, मैं ही,
अपने आप से बाहर निकल,
उनमें खो जाती हूँ.
किसी और की ज़िन्दगी जी लेती हूँ.
खुद को देखती हूँ,
पूरा !
एक साथ !!