रविवार, 6 दिसंबर 2009

कोई कोई नज़्म,
उलझ जाती है...
शब्दों के हेर फेर में.

या बढ़ नहीं पाती,
शुरू होने के बाद.

किसी,
शब्द के अभाव में,

और...
ख्यालों में ही दम तोड़ देती है अक्सर.

आधी अधूरी कोई नज़्म,
किसी,
अधूरे,
...रिश्ते कि तरह,

आओ...
संभाल के रख दें,
इस नाज़ुक से रिश्ते को,
किसी,
दराज़ में छुपा कर,
और भूल जाएँ इसे रख कर...
हमेशा के लिए.

शायद कुछ नज्में,
कुछ रिश्ते,
और कुछ लोग हमेशा रहते हैं...

आधे अधूरे.

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